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INDIA: घरेलू हिंसा से अशांत होता समाज

Contributors: रोली शिवहरे
August 27, 2012
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रोली शिवहरे

भारत में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसका प्रभाव अंततः व्यापक तौर पर समाज में महिलाओं के प्रति दुव्र्यवहार एवं यौन हिंसा के रूप में भी सामने आ रहा है। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि जब तक हमारे घरों में हिंसा खत्म नहीं होगी तब तक समाज में व्याप्त हिंसा में कमी आने की बात सोचना भी बेमानी है।

मध्यप्रदेश के इंदौर के एक शंकालु पति द्वारा अपनी पत्नी के यौनांग पर लगातार पांच साल तक ताला लगाने की घटना ने पूरे देश को शर्मसार कर दिया है। इस हैवानियत से तंग आकर एक दिन पत्नी ने जहर खा लिया तब इंदौर के एम. वाय. अस्पताल में डाॅक्टरों की जांच के दौरान यह बात सामने आई कि उसका पति रोज सुबह काम पर जाते समय ताला लगा देता था और शाम को काम से लौटने पर ताला खोलता था। ये घटना मानवीयता और पुरुषवादी सोच का घिनौना चेहरा हमारे सामने लाती है।

महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि अब उनके लिये परिवार भी एक सुरक्षित जगह नहीं है। परिवार के अंदर होने वाली हिंसा के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस पर लगाम लगाने के लिये ही ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ बनाया गया था। राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो के 2011 आंकड़े दर्शाते हैं कि वर्ष 2011 में मध्यप्रदेश में बलात्कार के जहां 3406 मामले दर्ज हुए वहीं पति द्वारा की गई हिंसा के 3732 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें दहेज के कारण होने वाली हत्याओं को भी देखना महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि प्रदेश में प्रतिदिन 2 महिलाएं दहेज के लिए जला दी जाती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 15-49 वर्ष की 45 प्रतिशत महिलाएं शारीरिक हिंसा का शिकार हुई हैं वहीं 10 प्रतिशत ने यौन हिंसा झेली है।

सर्वेक्षण एक चैकाने वाली यह सच्चाई भी हमारे सामने लाता है कि प्रदेश की 51 प्रतिशत महिलाओं ने किसी विशिष्ट परिस्थिति में पुरुष द्वारा उन पर की गई शारीरिक हिंसा को उचित ठहराया है। ये विचारणीय है कि महिला अपनी ही मार पिटाई को क्यों जायज ठहराती है? हम जिस समाज में रहते हैं उसमें परिवार के मुखिया का दर्जा हमेशा पुरुष को ही दिया जाता है। वहीं परिवार के सभी निर्णय लेता है। दरअसल इन सबके पीछे जिम्मेदार कारकों में सामाजिक सांस्कृतिक मूल्य भी अहम स्थान रखते हैं। भारतीय समाज में पत्नी की कल्पना महज पतिव्रता स्त्री से की गई है। भले ही उसका पति चाहे कितना कुकर्मी क्यों न हो।

भारतीय समाज को जिस तरह से 4 वर्णों और आश्रमों में बांटा उसी तरह महिलाओं को भी न केवल बांटा गया है बल्कि एक कदम आगे बढ़कर समाज ने उनके ऊपर अपने रीति रिवाजों के लेबल भी चिपका दिए हैं जो जीवनभर उसके साथ चिपके रहते हैं। जब लड़की कुंवारी होती है तो उसकी वेशभूषा से पता चल जाता है। शादी के बाद उसकी मांग में सिन्दूर ऐसे भरा जाता है जैसे किसी ने मकान खरीदकर उस पर नेमप्लेट लगा दी हो। किसी कारणवश उसके पति की मृत्यु हो जाती है तो उसके सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलते देर नहीं लगती। कई जगह उसे सर मुंडवाने से लेकर सफेद कपड़े पहनने तक को मजबूर किया जाता है। और तो और कई बार उन्हें घर से भी निकाल दिया जाता है और उन्हें भजन - पूजन की सलाह दी जाती है। समाज में ऐसी मान्यता है कि अगर विधवा के हाथ से किसी शुभ काम की शुरुआत की जाती है तो वो काम कभी सफल/ शुभ नहीं हो सकते।

हिन्दू धर्म में विवाह एक महत्वपूर्ण कर्म है। इस कर्म पर गौर करने पर हमें साफ पता चलता है कि सामाजिक रीति रिवाजों में पुरुषवादी सोच कितनी कूट-कूट कर भरी गई है। विवाह के दौरान वर और वधू दोनों से कुछ प्रतिज्ञाएं कराई जाती हैं, जिसे हम सात फेरे भी कहते हैं। इसमें एक फेरे में वर, वधू से यह वचन लेता है कि वह घर और बच्चे संभालने की जिम्मेदारी निभाएगी। एक वचन में यह कहा गया है कि पत्नी के लिये हमेशा पति ही सबकुछ होगा वो दूसरे आदमी पर नजर नहीं डालेगी। कन्यादान के रिवाज पर तो लगातार सवाल उठ रहे हैं पर मुश्किल यह है कि जब राज्य ही एक लड़की के दान की वकालत करने लगे तो फिर किससे उम्मीद की जा सकती है? ज्ञात हो मध्यप्रदेश सरकार ने कन्यादान योजना लागू की है।

यह किसी एक धर्म विशेष का मामला नहीं है कमोवेश हर धर्म के यही हाल हैं। एन.एफ.एच.एस.- 3 के आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश में अन्य धार्मिक समुदाय की तुलना में मुस्लिम महिलाएं शारीरिक, भावनात्मक और यौन प्रताड़ना की अधिक शिकार होती हैं। अगर भिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के आधार पर महिलाओं पर होने वाली हिंसा की तुलना करें तो पता चलता है जैन महिलाओं में 27.7 व हिंदू महिलाओं में 48.6 की तुलना में सर्वाधिक 60.8 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं हिंसा का दंश झेलती हैं। भोपाल में मुस्लिम समुदाय के साथ काम करने वाले जावेद अनीस का कहना है कि पुरुषवादी सोच का एक उदाहरण ही है कि निकाह के दौरान दोनों की सहमति ली जाती है पर अगर महिला किसी कारणवश अपने पति से अलग होना चाहती है तो उसे काजी के पास जाना होगा लेकिन पति कहीं से भी 3 बार तलाक कह दे तो तलाक हो जाता है।

भारत का संविधान तो सबको बराबरी का दर्जा देता है, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की वेबसाइट के अनुसार महिलाओं से संबंधित 43 कानून बने हैं परन्तु इनके क्रियान्वयन की स्थिति क्या है यह किसी से छुपी नहीं है। इसी का कारण है कि महिलाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। स्पष्ट है कि कहीं ना कहीं कानून बनाने और उसे जमीन पर लागू कराने की मंशा में विरोधाभास है। भोपाल में परिवार परामर्श केंद्र की एक काउंसलर ने कहा हमारे पास आने वाले 90 प्रतिशत पारिवारिक हिंसा के प्रकरणों में हम समझौते की ही कोशिश करते हैं। जब इस तरह के कानूनों के क्रियान्वयन में लगे रहने वाले लोगों का मानस ही ऐसा होगा तो एक महिला कैसे लड़ पायेगी? सवाल यह भी है कि क्या इन सब कारकों के पीछे केवल सरकार ही दोषी है या कहीं समाज भी जिम्मेदार है?

महिलाओं के ऊपर बढ़ती घरेलू हिंसा के कारणों की एक बड़ी वजह उनका चहारदीवारी लांघना भी है। आज हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुष के साथ बराबरी से चल रही हैं। वे किसी भी बंदिश में नहीं रहना चाहतीं। समाज व परिवार इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा क्योंकि इस पुरुषसत्तात्मक समाज में हमेशा पुरुष को ही सर्वोच्च माना गया है। इस स्थिति को बदलने हेतु तत्काल प्रयास करने होंगे। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हम पुरुषसत्ता के सापेक्ष किसी मातृसत्ता की बात कर रहे हैं बल्कि हम तो सिर्फ बराबरी की बात कर रहे हैं। सुप्रसिद्ध नारीवादी कमला भसीन का कहना है कि पति का अर्थ स्वामी होता है और यदि पति के रूप में एक स्वामी होगा तो निश्चित रूप से दूसरा दास ही होगा। ऐसे में बराबरी पर आधारित रिश्तों से ही कुछ उम्मीद की जा सकती है।

About the author: Rolly Shivhare is an Associate Coordinator at Vikas Samvad. She can be contacted at rollyshivhare@gmail.com

Document Type :
Article
Document ID :
AHRC-ART-076-2012-HI
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